Thoughts of saints.

हर एक आम इंसान की इच्छाएं बेहद बलबती होती हैं और इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति उल्टे-सीधे कर्म एवं सोच अपना लेता है।
इच्छा की पूर्ति पर खुश एवं पूर्ण न होने पर रंज-ओ-गम में डूब जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक इच्छाओं का तांता सा लगा रहता है और कभी पूर्ण न होने वाली इच्छाओं की आपूर्ति के लिए व्यक्ति निरन्तर प्रयासरत रहता है, दौड़-भाग करता रहता है।
व्यक्ति की इसी व्यथा का निराकरण एवं निवारण हेतु रब्बी महापुरुषों ने यह फरमान जारी किया कि यदि इन असीमित इच्छाओं को सीमित किया जाए या इच्छाओं पर अंकुश लगाया जाए तो इच्छाओं की मृगतृष्णा से सहजता और सरलता से निजात मिल सकती है और इसके लिए परमावश्यक है कि मन पर अंकुश लगाया जाए।
परन्तु मन बहुत ही चंचल है, बेलगाम का घोड़ा है और जबतक इस मन पर तत्वदर्शी सत्गुरू द्वारा तत्वदर्शन की लगाम न लगाई जाए, इसका नियंत्रित होना असंभव है।
अतः इस मन पर लगाम, केवल पूर्ण सत्गुरू ब्रह्मज्ञान प्रदान करके लुप्त दिव्य गुणों को उजागर करके, ही लगा देता है और उन दिव्य गुणों में सन्तोष की विशेष महत्ता है:
सबर सिदक दा चोला होवे, तेरा इक सहारा रहे।
साधू रहकर दुनिया उत्ते, बांग कमल दे न्यारा रहे।
इस मायावी जगत में, यदि किसी चीज की प्रधानता बताई गई है,
तो वह केवल सन्तोष ही है ।

…….सतीश मोरे जी

……#Sngms

Published by Sngms

Atarra Banda Uttar pradesh India

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